Monday, 15 April 2013

भारतवर्ष में जन्म लेने पर मुझे गर्व है पर ये गर्व उस वक़्त धुमिल हो जाता है जब मेरे नाम के साथ हिन्दू जुड़ता है |

 भारतवर्ष में जन्म लेने पर मुझे गर्व है, भारतवर्ष में हिन्दू परिवार में जन्म हुआ  परन्तु मैं शर्मिंदा हुं मेरा जन्म भारतवर्ष में हुआ सच कहुं तो ये असली वजह नहीं है आकिकत कड़वी जरूर है पर सच हमेशा कड़वा ही होता है भारतवर्ष में जन्म लेने पर मुझे गर्व है पर ये गर्व उस वक़्त धुमिल हो जाता है जब मेरे नाम के साथ हिन्दू जुड़ता है, सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी सत्ता हांसिल करने के लिए भोली भाली जनता को गुमराह करते चले आ रहे हैं, राम मंदिर अरे पहले से ही इतने मंदिर हैं की आम इंसान का जीवन भी बीत जाये पर वह अपने सर पर अपनी छत बना पाने में असमर्थ है वहीं दुसरी ओर हिन्दूयों के हिताशी बताने वाले शानदार विदेशी गाडियों के काफिले के साथ चलते नजर आ ही जाते है नाम आश्रम का पर सवाल उठता है वो कितने एकण में समाया है और उसके अन्दर कितने गरीबों को सहारा मिल रहा है, कितने भूखे गरीब धुखियारे और बिमारीयों से ग्रस्त इन्सानों के लिए सुविधा उपलब्ध कराई जाती है....वहां क्या होता है इस पर किसी तरह की टिप्णी नहीं देना चहुगं परन्तु जनता के समक्ष हाल में हुए खुलासे धुंधले नहीं पड़े होंगें, और आप कितना इंसानियत का खून करना चाहते हैं 50-50 रूपए और खाना दे कर भूखे गरीबों को पकड़ा दिया अपना झंडा और लगा के नारा बन गए महाराज, और कौन है जो प्यार से नहीं मान रहा, ये पत्थर फिकवाने के पीछे भी आप हैं, इतिहास गवाह है, कि आज तक हिन्दू मुस्लिम के दंगे में आप बड़े लोगों और आपके परिवार के सदस्यों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची | और कितना बटवारा करना चाहते हैं आप हिन्दुस्तान कि अवाम को दो पक्षों में आपने बांटा इतनी नफरत भर दी कि बच्चे देश कि एक ही सीमा को सबसे पहले जन्तें हैं | पकिस्तान और हिन्दुस्तान आपके द्वारा किये गए कुछ अतभुत कार्यों को कलम के जरिए शब्दों में पिरोने कि कोशिस मात्र करी है पहला चरण: जाति को दो पक्षों में आपने बांटा नामकरण हुआ जातिवाद फिर क्षेत्र बटवारा हाल में आमची मुंबई का नारा सफल रहा नामकरण हुआ क्षेत्रवाद , ऐसे और भी है जैसे आतकंवाद ये आतंकवाद तो होना ही था और उसकी वजह थी आप सिर्फ आप.....
        नहीं है जरूरत इसे किसी के नाम कि यही है जड़ उस शीतल हरे भरे वृक्ष की जिसमे टहनी ही मात्र रह गई नोच गए अपने फ़ाएदे के वो सत्ता लोभी खुद कि साफ़ छवि जन हितैषी साबित करने निकल पड़े जनता के पास लगा के नारा करके बुलंद अपनी आवाज कर के दिखा देगें फिर से हरा भरा इसी सूखे वृक्ष को और मन में लिए लालसा टहनी है अभी शेष उस सूखे वृक्ष में अब देखो इसकी बारी भी आयी, ये कैसी है लालच इनमे समायी भूल कर सब कुछ बन बैठे ये अनुनायी नहीं है कुछ और इनका ही है सब, अवाम को सुनाने कि कसम है मैंने खायी : भाइयों जागो और देखो यही हैं | भगवा-वाद ........भगवा-वाद .......भगवा-वाद ........

यही है सबसे खतरनाक डरना है हमें तो है ये आतंकवाद से भी खतरनाक घरों में छिप जाओ  या फिर दो उनको ऐसा जवाब आने वाली पीढ़ी जी सके अमन के साथ गर्व से याद करके ले तुम्हारा नाम |
मैं शर्मिंदा हुं क्योंकि मेरा जन्म भारतवर्ष में हुआ सच कहुं तो ये असली वजह नहीं है आकिकत कड़वी जरूर है पर सच हमेशा कड़वा ही होता है भारतवर्ष में जन्म लेने पर मुझे गर्व है पर ये गर्व उस वक़्त धुमिल हो जाता है जब मेरे नाम के साथ हिन्दू जुड़ता है, सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपनी सत्ता हांसिल करने के लिए भोली भाली जनता को गुमराह करते चले आ रहे हैं, राम मंदिर अरे पहले से ही इतने मंदिर हैं की आम इंसान का जीवन भी बीत जाये पर वह अपने सर पर अपनी छत बना पाने में असमर्थ है वहीं दुसरी ओर हिन्दूयों के हिताशी बताने वाले शानदार विदेशी गाडियों के काफिले के साथ चलते नजर आ ही जाते है नाम आश्रम का पर सवाल उठता है वो कितने एकण में समाया है और उसके अन्दर कितने गरीबों को सहारा मिल रहा है, कितने भूखे गरीब धुखियारे और बिमारीयों से ग्रस्त इन्सानों के लिए सुविधा उपलब्ध कराई जाती है....वहां क्या होता है इस पर किसी तरह की टिप्णी नहीं देना चहुगं परन्तु जनता के समक्ष हाल में हुए खुलासे धुंधले नहीं पड़े होंगें, और आप कितना इंसानियत का खून करना चाहते हैं ५०-५० रूपए और खाना दे कर भूखे गरीबों को पकड़ा दिया अपना झंडा और लगा के नारा बन गए महाराज, और कौन है जो प्यार से नहीं मान रहा, ये पत्थर फिकवाने के पीछे भी आप हैं, इतिहास गवाह है, कि आज तक हिन्दू मुस्लिम के दंगे में आप बड़े लोगों और आपके परिवार के सदस्यों को कभी कोई हानि नहीं पहुंची | और कितना बटवारा करना चाहते हैं आप हिन्दुस्तान कि अवाम को दो पक्षों में आपने बांटा इतनी नफरत भर दी कि बच्चे देश कि एक ही सीमा को सबसे पहले जन्तें हैं | पकिस्तान और हिन्दुस्तान आपके द्वारा किये गए कुछ अतभुत कार्यों को कलम के जरिए शब्दों में पिरोने कि कोशिस मात्र करी है पहला चरण: जाति को दो पक्षों में आपने बांटा नामकरण हुआ जातिवाद फिर छेत्रों कि बटवारा हाल में आमची मुंबई का नारा सफल रहा नामकरण छेत्रवाद, ऐसे और भी है जैसे आतकंवाद ये आतंकवाद तो होना ही था और उसकी वजह थी आप सिर्फ आप.....
       नहीं है जरूरत इसे किसी के नाम कि यही है जड़ उस शीतल हरे भरे वृक्ष की जिसमे टहनी ही मात्र रह गई नोच गए अपने फ़ाएदे के वो सत्ता लोभी खुद कि साफ़ छवि जन हितैषी साबित करने निकल पड़े जनता के पास लगा के नारा करके बुलंद अपनी आवाज कर के दिखा देगें फिर से हरा भरा इसी सूखे वृक्ष को और मन में लिए लालसा टहनी है अभी शेष उस सूखे वृक्ष में अब देखो इसकी बारी भी आयी, ये कैसी है लालच इनमे समायी भूल कर सब कुछ बन बैठे ये अनुनायी नहीं है कुछ और इनका ही है सब, अवाम को सुनाने कि कसम है मैंने खायी : भाइयों जागो और देखो यही हैं | भगवा-वाद 

Friday, 12 April 2013

भगती के सैलाब में देसी घी कि लौ से रोशन ....होने वाले खर्च का आकलन

मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर आप सब मुझे गलियां दें, पर फिर भी अपने आप से पूछियेगा कहीं न कहीं आप के अन्दर भी ये सवाल है बस फर्क इतना है कि मैं इस सवाल को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हुं और आप उसे अपने भीतर दबाये बैठे हैं---
नवरात्री का पर्व यानी माँ देगीं आशीर्वाद ये है हमारा भारत वर्ष फिर कुछ दिनों बाद भोले बाबा का पर्व, गणेश पर्व, दीपावली ऐसे अनगिनत पर्व आते है और हम चल पड़ते हैं आशीर्वाद पाने लाखों करोणों रूपए कि मुर्तियां बनती हैं और ऐसा भक्ती का सगंम बनता है अमीर हो या गरीब खुल कर दान करना, भगती के सैलाब में देसी घी कि लौ से रोशन हर किसी के घर में पर्व कि उत्सुकता और उसमे होने वाले खर्चे कि चर्चा का अतभुत मिलन, ये हमारे भारतवासी हैं जो अक्सर आप को चाय कि दुकानों में चर्चा करते मिलेगें देश का बुरा हाल है सरकार ने आम आदमी को मार दिया महगाई चरम सीमा पार कर गई है क्या होगा भगवान के भरोसे बैठो............ एक बार सिर्फ एक बार हमने सोचा क्या वाकई में हमारे हाथों में कुछ नहीं है, और क्या हमे हक़ है कि हम ऐसे पर्व मनायें जिसमे पहले ही कहा गया है बुराई का अंत हो, असत्य का नाश हो और सत्य कि विजय हो, हममें से कोई एक ऐसा है जो बुरा ना करता हो जो सत्य के पथ पर हो, जिसने अपने फायेदे के लिए किसी को हानि ना पहुंचाई हो आखिर कौन सा ग्रन्थ है जिसमें ये लिखा है कि पर्व को ऐसे मनायो पैसे बहाव और अपने पापों को मिटाओ नहीं     मिलेगा कहीं नहीं अरे जितने पर्व हम हिन्दू मनाते हैं उसमें होने वाले खर्च का आकलन किया कभी कम होने कि बजाये बढता ही जा रहा है, असली कारण यह है कि हम जिस तरह के कार्यों में लिप्त हैं हम  डरते हैं और अपनी बुराई को पर्वों में पैसे और श्रधा का झूठा ढोगं करके अपनी अंतरात्मा को झूठी दिलासा देतें हैं कि जो कुछ किया माँ ने माफ़ किया, सच यही है सच से भागना मुश्किल है आप अपने आप को तो समझा सकते हैं अपने बुरे कार्य को अपने से माफ़ कर सकते हैं पर ये छलावा क्या वाकई काम करेगा जो रचिता है हमारा क्या हम उसे बेवकूफ बना सकते हैं, हम डरते हैं क्योंकि हम जानते हैं हम गलत कर रहे हैं मगर इसका समाधान ये है तो वो हमारी भूल है यदि सत्य से भागोगे तो असत्य ही सत्य का रूप लेगा जैसा कि हो रहा है, अगर हमें इतनी ही ग्लानी है, और गलत कार्यों से पीछा नहीं छुटा सकते और छुटायें भी तो कैसे ये कलयुग है, पर हम अपनी संतुष्टि के लिए मूर्ति नहीं मूर्तीकारों को कुछ दे सकें | मनाओ पर्व ऐसा जहां कोई न हो छोटा न हो कोई मूरत न मन्न में हो कोई मंत्र न हो द्रेश और न हो कोई मतभेद पर्व में न बने मिष्ठान चाहे न जले घी से लबा लब कोई दिया, कुछ  बने तो बस साफ़ पकवान और मिटा सके भूख उन मासूमों कि जिनको देना भूल गया ये भगवान, शायद इसी लिए किया है उसने इंसानों में बटवारा एक तरफ तो है करोणपति दो दुसरी ओर सिर्फ कारणों भूखे   जन का काफिला,सोचना तो पड़ेगा हम सब को क्यों बनाया है ऐसा संसार जहां हर पल लेता है एक बच्चा इस दुनियां में सांस फर्क पड़ जाता है कोई लेता है जन्म राजा के परिवार में तो दुसरा रंक के दरबार में तुम्ही तो कहते हो उसकी नजर में सब हैं समान फिर क्यों हो जाता हैं ऐसा कोई पैदा होते ही बन बैठता है युवराज तो दुसरी ओर पैदा हुआ बच्चा बन जाता है एक भार |
                                                       
                                                                                                         लेख : स्वप्निल मालवीय          

Sunday, 24 February 2013

जहाँ देश में इतने घोटाले हुए हैं वही एक और घोटाला.

जहाँ देश में इतने घोटाले हुए हैं वही एक और घोटाला. कुछ तथ्यों का पता लगाया गया है जिससे यह शंका जाहिर होती है की नोएडा समेत ग़ाज़ियाबाद जैसे इलाकों में भूमि घोटालो का पर्दाफाश हो सकता है. इस घोटालों के तहत रातों रात कुछ साधारण बिल्डर्स नामी गिरामी बिल्डर्स कतार में आ जातें हैं. इस जांच में कुछ बड़े बिल्डर्स के नाम भी सामने आ सकतें हैं. अभी और तथ्यों की खोज जारी है.
पर सवाल ये है की गरीब कि गरीबी नहीं मिटती तो अमीरों कि अमीरी लगातार साल दर साल देश कि जनसंख्या सी रफ़्तार पकडे हुए है, गाजियाबाद मे भी नामी गिरामी बिल्डर अपने पैसे और रुतबे के चलते किसी और कि जमीन पर अपना हक बनाये रखने मे कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते ऐसी खबर चौका देने वाली है सवाल उठता है क्या ?
कम समय में लाखों से करोड़ों और कई हज़ार करॊडों कि संपत्ति के पीछे ऐसी कितनी और जमीनों को का सहारा ले कर धन अर्जित किया है और ये भी कि जिसकी जमीन है उसकी मौत पर भी सवालिया निशान लगता है? कुछ और तथ्यों के सामने आने पर ऐसे और भी  घटनाओ के सामने आने की संभावना है.

Wednesday, 16 January 2013

गूगल पर सरकार द्वारा सेनसर बोर्ड गठन पर मेरे व्यक्तिगत विचार


मैं, ई० स्वप्निल मालवीय निवासी इलाहाबाद उ० प्र० |
         भारतीय संविधान द्वारा प्राप्त भारतीय नागरिक के सवैंधानिक अधिकार का उपयोग करते हुये, गूगल पर सरकार द्वारा सेनसर बोर्ड गठन पर मेरे व्यक्तिगत विचार | सर्वप्रथम समस्त मा० नेतागण को धन्यवाद! एक बार फिर समस्त मा० नेतागण ने अपनी एकता का उदाहरण देश के हर आम नागरिकों को देने में कामयाबी हांसिल कर ली और जब जब संसद हो या विधान सभा जहाँ पर नेताओं के फायेदे की बात पर सभी की एकता का अत्भुत परिचय देखते ही बनता है, लेकिन जहाँ बात आम इंसान के लिए पारित होने वाले कानून की हो या किसी विकास की वहाँ पर होने वाली आम बहस को  युद्ध में तपदील करने में तनिक भी देरी नहीं करते |  हमारे मा० नेतागण ने फिर एक बार नैतिकता, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अधार पर आम जनता की स्वतंत्रता का हनन करने की पूण तैयारी कर ली है, पर एक आम नागरिक के अधिकार से एक सवाल जरूर पुछना रहा हुँ, क्या आप सभी इतने चिन्तित हैं, हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के लिये, यदि हाँ, तो सबसे पह्ले सेनसर लोकसभा, राज्यसभा ऐवं देश की अन्य विधान सभा पर सेनसर की जरूरत है, जिस तरह की सभ्यता, और भाषा का उपयोग किया जाता है, उससे हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति का परिचय ना सिर्फ भारत में बल्की सम्सत विश्व में  प्रदर्शित होता है, लेकिन शायद इस पर कभी सेनसर नहीं लग पाये, बस अब बहुत हो गया जिस दिन पब्लिक ने ये शब्द कह दिये उस समय वोट मागंने पहुँचे ..... क़माल होगा|
“पहले अपना घर तो साफ कर लो तब दुसरे की गन्दगी के बारे में विचार |

                                                                 धन्यवाद

Saturday, 5 January 2013

तापमान में आयी गिरावट वहीँ उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चड़ा


जहाँ उत्तर प्रदेश में लोगों को तापमान में आयी गिरावट से शर्द मौसम में ठिठुरता बुरा हाल नजर आ रहा है वहीँ उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चड़ता ही दिख रहा है और आगामी लोकसभा चुनाव तक मानसून के अभिलेख (रेकार्ड) की तरह पिछले सारे (रेकार्ड) अभिलेखों को तोड़ देना वाला है वैसे तो हर लोक  सभा चुनाओ में कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिलता है पर आगामी लोक सभा चुनाव कई कारणों से ज्यादा रोचक होने वाला पर यहाँ हम किसी तरह की धांधली पर चर्चा नहीं करने वालें हैं। आइये आगामी लोक सभा चुनाव के कुछ  ख़ास रोचक तत्वों पर रौशनी डालते हैं । वैसे तो परिवारवाद राजनीति में कोई नई बात नहीं रही पर ये चुनाव कई माएनो मेँ भारतवर्ष की राजनीतिक परिभाषा को बदल कर रखने में कारगर साबित होगा एक तरफ कांग्रेस  के  युवराज  राहुल  गांधी तो अपने कड़े फैसलों और एक के बाद एक  नई योजनायों का तोहफा देते युवा मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव  ने  उत्तर  प्रदेश में अपनी छवि अपने कार्यों से दमदार आगाज़ किया है, अभी तक के कार्यकाल में एक भावी नेता की छवि जनता के सामने प्रस्तुत की है तो वहीं दुसरी ओर युवराज श्री राहुल गांधी सरकार के भ्रष्टाचार से निकलने के विफल प्रयास करने में व्यस्त नजर आ रही है, अगर यही हाल रहा तो उत्तर प्रदेश में युवराज पार्टी लोकसभा चुनाओं की दौड़ से ही बहार हो सकती है क्योंकि उत्तर प्रदेश में केवल दो जिलों नहीं है प्रदेश की जनता वो मुर्खता दोहराना नहीं चाहेगी, हर बार की तरह इस बार युवराज ट्रम्प कार्ड नहीं चलने वाला जनता भूली नहीं की चुनाव के पूर्व जोर शोर से रैली करना दलित के घर रहना और चुनाव बाद विदेश में समय बिताना ये प्रदेश की जनता की भूल थी जो उसने युवराज की राजनीति में परिपक्व माना शायद युवराज खुद भी ये बात अच्छी तरह से जानते हैं तभी सरकार में पद लेने के अपने फैसले से कदम पीछे कर लिया पर ये फैसला जनता की समझ से परे है |
                                                                                                                                                                                                                    लेख:-  ई० स्वप्निल मालवीय


जागो जन तो कभी जागो कितने और दिन ?


जागो जन तो कभी जागो कितने और दिन ?
जागो - जागो – जागो, कभी अन्ना ने कहा, हमने भी कहा करके बुलंद अपनी आवाज़ जागो - जागो, का लगा डाला नारा  कभी आतंकवाद पर लगाया, कभी किसी बच्चे की मौत पर तो कभी किसी महिला के साथ हुए दुष्कर्म के लिए लेकिन ये जागो भारत जागो का नारा एक दिन, दो दिन, एक सप्ताह या एक महीना अरे बंद करो पीछे चलना जगा कर खुद की सोच समझ न सिर्फ कहो, ना सिर्फ सुनो, ना सुनायो, ना कुछ बनाऒ, ना रह जाना बनके श्रोता किसी नेता या अभिनेता के उपदेशों का शिकार, बस बहुत कर लिया श्रोता का किरदार, मत तलाशो कोई सेनापती, युद्ध नहीं है किसी और का, और नहीं है कोई योध्या, और ना है शूरवीर, युद्ध है सिर्फ तुम्हारा मत करो अपने कदमों को पीछे, उठाओ इतिहास और देखो शूरवीरों की कहानी, आज तुम ही हो महाराणा प्रताप, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचन्द्र बोस... ये मत भुलना कभी ये भी थे आम इंसान इनके विचारों ने नहीं बनाया इनको महान किये थे इन्होने कुछ अतभुत प्रयास जो बन गया इतिहास, बस मत सोचों, मत देखो, मत करो और ना करो अब किसी का इंतज़ार सारे सवालों के जवाब के लिए करना है बस तुमको ही प्रयास, चलते चलते कब तुम से बनेगें हम और हम से हम सब, बस चल पड़ो इस सपने को करने सकार, जब आये कठनाई बस कर लेना याद ये वही है संसार जहाँ खुद की शक्ति भूल गए थे भगवान श्री हनुमान, तो तुम तो हो एक आम इंसान, चल पड़ो बनाओ ऐसा पथ आने वाली पीड़ी को दे कर जाओ एक अनोखी सौगात, याकिन मनो मुझे है पूरा विस्वास लहराओगे विजय ध्वज बनाओगे इतिहास बस करना है ये याद तुम ही हो सेनापती तुम ही योध्या और तुम्ही हो शूरवीर कर जाओ ऐसा काम, तुम से हम और हम से हम सब होगें जरूर पर करना है एक प्रयास, नहीं है युद्ध किसी महिला पर किये गए अत्याचार का ये है कदम एक बड़े बदलाव का, एक बड़े बदलाव का ||
                                                                                                                  लेख:-  ई० स्वप्निल मालवीय