ये क्या
हो रहा है भारती युवा वर्ग की सोच का दायरा बडा है अच्ही बात है पर कितनी, आये इसका अवलोकन करें आज
युवा वर्ग अकसर दिखायी देगें जिनकी चरचा आस पास अपने शहर में हो रही घठनाओ पर नहीं हो कर अमेरिका में क्या चल रहा है अंतरराष्ट्रीय स्तर से
निचे नहीं होता, अगर हमने अपनी सोंच को इतना फैलाया है तो थोडा
सा आगे ही एक पड़ाव है हमारे बाद आने वाली जनरेसन को हम क्या सोंच दे रहे है
? क्या इस देश के नवजवान ऑरकुट,फेसबुक और भी कई
पोर्टल पर रूम मे ए.सी.का मज़ा लेते हुए
लैपटॉप... पर ऐसे अपनी सोच शेयर करते रहेगे और बाद मे उसपर क्या कमेन्ट आया कितनो
ने लाईक किया ये सब देख कर खुश होते रहेगे पर कभी सच का सामना नहीं करेगे किसी चीज
का विरोध करने रोड पर नहीं उतरेगे और सबसे अच्छा बहाना हमारे देशवासियों के पास है
नेता ख़राब है अपना समय क्यों बर्बाद करे, अरे यार गैस का
रेट बड़ गया कोई बात नहीं कुछ कटौती कर लेगे ओह हद हो गई फिर से पेट्रोल का रेट
बड़ गया ये सरकार आम आदमी को मार डालेगी, चलो यार फालतू मे
कार नहीं निकालेगे. ये है हमारे देशवासी ! जबकि तथ्य पाँच शब्दों मे छुपा है जिसे
हर देशवासी को खुद अपने आप से ये सवाल करना और हल तलाशना है…. क्या क्यों और कब तक इसका जवाब मुझे नहीं चाहिए
ये सवाल हर उस इंसान से है जो सिर्फ अपने परिवार की ख़ुशी गम की सोच से थोडा सा
अलग अपने पडोसी के दुःख दर्द के लिए भी सोच सके" आवाज उठाना अच्छी बात है
लेकिन आज जो देशवासी अपने आस पास हो रही वारदातों से पल्ला झाड लेते है, क्या पडोसी देश से अलग है, हमें ये नहीं भूलना चाहिए
गली, रोड, गाँव, शहर
का संगम ही देश है और हम जब अछे पडोसी नहीं बन सकते अपने शहर की सफाई नहीं कर सकते
अपने आस पास हो रही घटनाओं पर आवाज नहीं बुलंद कर सकते तो क्या हमें सच मे ये हक़
है इतना बड़ा सोचने पर, हम सब ये जानते है कि सीधे हम डॉक्टर
नहीं बन सकते,अगर भूख लगती है तो पहले खाना तो बनाना ही
पड़ेगा, ये हमारी विडम्बना है कि आज हमारी सोच-समज तुलनात्मक हो
चुकी है हम भूल चुके है कि नीवः कमजोर है तो महल ज्यादा समय तक टिक पाना मुमकिन नहीं
है |
हम नहीं
होगे 50 साल से 60
साल कुछ 70 साल के बाद तब हमसे ना कोई सवाल
पूछने वाला होगा और ना जवाब के लिए मंथन करना होगा, अपने लिए
क्या बनाया ये मायने रखता पर यदि हम थोडा ही सही पर विचार करें हम अपने आने वाली
जनरेसन को क्या दे कर गए? 100 मे से 5 लोग
भी थोडा ही विचार और उसी थोड़े से विचार पर थोड़ा सा अमल कर पाए |
लेख:- ई०
स्वप्निल मालवीय