मुझे जरा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर आप सब मुझे गलियां दें, पर फिर भी अपने आप से पूछियेगा कहीं न कहीं आप के अन्दर भी ये सवाल है बस फर्क इतना है कि मैं इस सवाल को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हुं और आप उसे अपने भीतर दबाये बैठे हैं---
नवरात्री का पर्व यानी माँ देगीं आशीर्वाद ये है हमारा भारत वर्ष फिर कुछ दिनों बाद भोले बाबा का पर्व, गणेश पर्व, दीपावली ऐसे अनगिनत पर्व आते है और हम चल पड़ते हैं आशीर्वाद पाने लाखों करोणों रूपए कि मुर्तियां बनती हैं और ऐसा भक्ती का सगंम बनता है अमीर हो या गरीब खुल कर दान करना, भगती के सैलाब में देसी घी कि लौ से रोशन हर किसी के घर में पर्व कि उत्सुकता और उसमे होने वाले खर्चे कि चर्चा का अतभुत मिलन, ये हमारे भारतवासी हैं जो अक्सर आप को चाय कि दुकानों में चर्चा करते मिलेगें देश का बुरा हाल है सरकार ने आम आदमी को मार दिया महगाई चरम सीमा पार कर गई है क्या होगा भगवान के भरोसे बैठो............ एक बार सिर्फ एक बार हमने सोचा क्या वाकई में हमारे हाथों में कुछ नहीं है, और क्या हमे हक़ है कि हम ऐसे पर्व मनायें जिसमे पहले ही कहा गया है बुराई का अंत हो, असत्य का नाश हो और सत्य कि विजय हो, हममें से कोई एक ऐसा है जो बुरा ना करता हो जो सत्य के पथ पर हो, जिसने अपने फायेदे के लिए किसी को हानि ना पहुंचाई हो आखिर कौन सा ग्रन्थ है जिसमें ये लिखा है कि पर्व को ऐसे मनायो पैसे बहाव और अपने पापों को मिटाओ नहीं मिलेगा कहीं नहीं अरे जितने पर्व हम हिन्दू मनाते हैं उसमें होने वाले खर्च का आकलन किया कभी कम होने कि बजाये बढता ही जा रहा है, असली कारण यह है कि हम जिस तरह के कार्यों में लिप्त हैं हम डरते हैं और अपनी बुराई को पर्वों में पैसे और श्रधा का झूठा ढोगं करके अपनी अंतरात्मा को झूठी दिलासा देतें हैं कि जो कुछ किया माँ ने माफ़ किया, सच यही है सच से भागना मुश्किल है आप अपने आप को तो समझा सकते हैं अपने बुरे कार्य को अपने से माफ़ कर सकते हैं पर ये छलावा क्या वाकई काम करेगा जो रचिता है हमारा क्या हम उसे बेवकूफ बना सकते हैं, हम डरते हैं क्योंकि हम जानते हैं हम गलत कर रहे हैं मगर इसका समाधान ये है तो वो हमारी भूल है यदि सत्य से भागोगे तो असत्य ही सत्य का रूप लेगा जैसा कि हो रहा है, अगर हमें इतनी ही ग्लानी है, और गलत कार्यों से पीछा नहीं छुटा सकते और छुटायें भी तो कैसे ये कलयुग है, पर हम अपनी संतुष्टि के लिए मूर्ति नहीं मूर्तीकारों को कुछ दे सकें | मनाओ पर्व ऐसा जहां कोई न हो छोटा न हो कोई मूरत न मन्न में हो कोई मंत्र न हो द्रेश और न हो कोई मतभेद पर्व में न बने मिष्ठान चाहे न जले घी से लबा लब कोई दिया, कुछ बने तो बस साफ़ पकवान और मिटा सके भूख उन मासूमों कि जिनको देना भूल गया ये भगवान, शायद इसी लिए किया है उसने इंसानों में बटवारा एक तरफ तो है करोणपति दो दुसरी ओर सिर्फ कारणों भूखे जन का काफिला,सोचना तो पड़ेगा हम सब को क्यों बनाया है ऐसा संसार जहां हर पल लेता है एक बच्चा इस दुनियां में सांस फर्क पड़ जाता है कोई लेता है जन्म राजा के परिवार में तो दुसरा रंक के दरबार में तुम्ही तो कहते हो उसकी नजर में सब हैं समान फिर क्यों हो जाता हैं ऐसा कोई पैदा होते ही बन बैठता है युवराज तो दुसरी ओर पैदा हुआ बच्चा बन जाता है एक भार |
लेख : स्वप्निल मालवीय